खुशबू बनकर  गुलों  से  उड़ा  करते  हैं, धुआं  बनकर  पर्वतों  से  उड़ा  करते  हैं, ये  कैंचियाँ  खाक  हमें  उड़ने  से  रोकेगी, हम  परों  से  नहीं  हौसलों  से  उड़ा  करते  हैं

मिलेगी परिंदों को मंजिल ये उनके पर बोलते हैं, रहते हैं कुछ लोग खामोश लेकिन उनके हुनर बोलते हैं

हो के मायूस न यूं शाम से ढलते रहिये, ज़िन्दगी भोर है सूरज सा निकलते रहिये, एक ही पाँव पे ठहरोगे तो थक जाओगे, धीरे-धीरे ही सही राह पे चलते रहिये.

कोई भी लक्ष्य बड़ा नहीं, जीता वही जो डरा नहीं.

जब  टूटने  लगे  होसले  तो  बस  ये  याद  रखना, बिना  मेहनत  के  हासिल  तख्तो  ताज  नहीं  होते, ढूंड  लेना  अंधेरों  में  मंजिल  अपनी, जुगनू  कभी  रौशनी  के  मोहताज़  नहीं  होते.